गुरूर ब्रह्या गुरूर विष्णु, गुरूर देवो
महेश्वराय।
गुरू साक्षात पर ब्रम्ह, तस्मय श्री गुरूवै नमः।।
शिक्षा संस्थाएँ ज्ञान गंगा हुआ करती हैं। यह अन्धकार को मिटाती है। प्रकाश को
फैलाती है, व्यक्ति की जड़ता को समाप्त करती है, उसमें गतिशीलता लाती है उसकी
स्वतंत्रता को सार्थक बनाती है, उनके व्यक्तित्व को निखारती है उनमें समाज एवं
राष्ट्र को समृद्धि अन्ततः इन शिक्षा संस्थाओं पर निर्भर करती है। किन्तु यह
विडग्बना ही है कि इन शिक्षा संस्थाओं से निकलने वाली युवा पीढी समाज एवं राष्ट्र
के प्रति अपने दायित्व से दूर दिखती है। अधिकांश युवा अपने व्यक्तित्व के निर्माण
से भी कोई सम्बंध नहीं रखते। पठन-पाठन का वातावरण औपचारिक होता जा रहा है। उसमें
निर्माण की क्षमता नहीं है जब कि आत्मनिर्माण किसी भी महान देश की प्राथमिकता हुआ
करती है। आज भौतिक साध्नों की प्रचुरता होते हुये भी विकास की दिशा में हमारी
उपलब्धियाँ अपेक्षा के अनुरूप नहीं है।
इस दिशा में चिन्तन की आवश्यकता है। नयी शदी की चुनौतियों का सामना करने के लिए
हमे अपने को विशेष रूप से तैयार करना होगा। युवकों में एक नयी कार्य संस्कृति और
रचनात्मक दृष्टि विकसित कर उनमें आज की बहुविध राष्ट्रीय आकांक्षाओं के अनुरूप एक
नयी चेतना का संचार करना होगा। कहने की आवश्यकता नहीं है कि शिक्षण संस्थाओं की
भूमिका इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। देश के शिक्षाविदों शासन के
नियामकों एवं समाज के प्रबुद्ध वर्ग से अपेक्षा की जाती है कि आज की शिक्षा के
सम्पूर्ण आयाम को व्यक्ति समाज और राष्ट्र के निर्माण की ओर उन्मुख करने का प्रयास
करें। इस महान देश को सम्द्ध एवं गौरवशाली बनाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम
होगा। इन्ही उद्देश्यों की प्रतिपूर्ति में देवाश्रम शिक्षण संस्थान सत्य एवं
निष्ठा से अपनी भूमिका का निर्वाहन कर रहा है, हमें आशा है कि आश्रम कि यह वरिष्ठ
शिक्षण संस्थान आपके उज्जवल भविष्य को निर्मित करने में सफल होगी।
.................... शान्ती, शान्ती, शान्ती स्वामी भगवान गिरि
अध्यक्ष/प्रबन्धक