देवाश्रम का इतिहास
उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में सरयू और छोटी गंडक नदियों के बीच स्थित लार कस्बा का
यह 'देवाश्रम' लगभग तीन सौ वर्षों से भी अधिक प्राचीन है। बाबा मौनीनाथ गिरि इस मठ
की परम्परा के प्रथम सिद्ध पुरूष थें। बाबा मौनीनाथ जी के बाद इस परम्परा में कई
अन्य सिद्ध-महात्मा हुए। सभी ने इस क्षेत्र की जनता के कल्यांण में ही अपना समय
व्यतीत किया। सभी महात्माओं ने आध्यात्मिक उत्कर्ष के लिए कठोर साधना की थी और
अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त कर इस क्षेत्र की भरपूर सेवा की। इस मठ की गुरू-शिष्य
परम्परा में आठवें पुण्य के रूप में स्वामी देवानन्द जी महाराज इस मठ के महन्त के
रूप में पदासीन हुये थें। इन्होंने इस साधना की मर्यादा के अनुरूप आध्यात्मिक
उत्कर्ष को प्राप्त करते हुए समाज-सेवा के कार्यों को भी महत्व देना प्रारम्भ किया,
फलतः इस क्षेत्र की निरक्षता धीरे-धीरे समाप्त होने लगी और मठ के अन्तर्गत संस्कृत,
हिन्दी एवं आंग्ल भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए विविध शिक्षण-संस्थानों की स्थापना
हुई। शारदीय नवरात्र की नवमी को माँ दुर्गा की अराधना के बाद पूर्णाहुति कर स्वामी
जी ब्रह्मलीन हो गये। इनके ब्रह्मभूत होने पर इस क्षेत्र के लोगों पर वज्रपात हो
गया। जनता अनाथ सी हो गयी। ऐसा लगता था कि निकट भविष्य में उनका कोई पथ-प्रदर्शक
नहीं मिल पाएगा। किन्तु बात ऐसी नहीं थी।
स्वामी चन्द्रशेखर गिरि जी महाराज का आगमन इस देवाश्रम के नवें महन्त के पद पर हुआ।
उनका जन्म देवरिया जिले के सलेमपुर तहसीलान्तर्गत बहोरवाँ ग्राम में हुआ था। ये
पायासी के 'मिश्र' परिवार में उत्पन्न हुए थें। इनकी माता जी का ननिहाल कस्बा लार
के एक तिवारी परिवार में था। इसी सम्बन्ध के चलते स्वामी जी बचपन में लार में आये
थें और स्थानीय मठ के तत्कालीन महन्त स्वामी देवानन्द जी महाराज से इनका सम्पर्क
बना। ये लड़कों के साथ प्रायः मठ पर आया करते थें। इनकी प्रतिभा एवं इनके निर्भिक
स्वभाव से स्वामी देवानन्द जी महाराज बड़े प्रभावित हुए और इनको विविध प्रयत्नों के
द्वारा अपना शिष्यत्व स्वीकार करने के लिए उन्होंने विवश किया। स्वामी जी से दीक्षा
लेने के बाद स्वच्छन्द होकर ये विभिन्न स्थानों में भ्रमण करते रहे। इनके निर्भीक
स्वभाव के कारण लोग इन्हें 'निर्भयानन्द' कहा करते थें। निर्भयानन्द जी का मन
पाठशालाओं में अध्ययन करने में नहीं लगता था किन्तु स्वाध्याय के बल पर विद्वानों
में भी समाहत रहे। निर्भयानन्द जी बड़े कर्मठ और प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति थें।
आसामान्य परिस्थिति में भी धैर्य के साथ अपनी योजना सम्पन्न करते थें। स्वामी जी
अपने समय के स्वतंन्त्रता-संग्राम के एक सफल सैनानी थें। देश जाति और
भारतीय-संस्कृति के प्रबल समर्थक तथा पोषक थें। जीवन भर इन्होंने संस्कृति के उच्च
आदर्शो का उद्घोष किया।कास किया अपितु अनेक समाज-हितकारी संगठनों की स्थापना कर वे
जीवन भर इन्हें नयी दिशा देते रहे, हिन्दु-संस्कृति एवं मानव-समाज का कल्यांण करते
रहें।
सन् १९६४ में स्वामी चंद्रशेखर गिरि जी महाराज ने स्थानीय स्वामी देवानन्द स्नातक
महाविद्यालय की स्थापना कर अपने गुरूदेव की इच्छा पूरी की। इस कार्य से मठ-संस्थान
में प्राईमरी से लेकर स्नातक श्रेणी तक का अध्ययन सुचारू रूप से प्रारम्भ हो गया।
स्वर्गीय पं० पवहारी शरण द्रिवेदी जी जैसे सफल प्राचार्य एवं पं० विश्वनाथ पाण्डेय
जी जैसे सहयोगी को प्राप्त कर स्वामी जी ने शीघ्र ही स्नातक स्तर तक कला संकाय के
साथ-साथ विज्ञान एवं प्रशिक्षण संकायों का संचालन भी सहज भाव से कर लिया जो उन
दिनों बहुत ही कठिन कार्य माना जाता था। स्वामी जो फूले नहीं समाते थें, जब कोई
आयोजन अपनी संस्थाओं में संस्कृति एवं जाति की विशेषताओं के अनुरूप होता था। तो वे
सभी समारोहों में विद्यमान रहते थें। उनके प्रभाव से यह शिक्षण संस्थान कभी भी
अनियन्त्रित एवं अशान्त नहीं हो सका। यहाँ के कतिपय आयोजनों में लाखों की जनसंख्या
उपस्थित हुई किन्तु थोड़ी भी अव्यवस्था नहीं होने पायी। जिला और प्रदेश प्रशासन भी
उनकी व्यवस्था की सराहना करता रहा। स्वंय उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल माननीय
श्री विश्वनाथ दास जी, जो शिक्षण संस्थाओं में जाने से सन्यास ले चुके थें, स्वामी
जी के बुलाने पर इस संस्थान में आए। यहाँ के वशाल आयोजन की शांति और अपने ढंग की
सुव्यवस्था को देखकर उन्होंने कहा था, ''मैं उत्तर प्रदेश में ही नहीं, भारत की
अनेक शिक्षण-संस्थाओं में गया हूँ लेकिन, स्वामी जी की संस्था जैसी सुव्यवस्थित और
नियंत्रित संस्था मुझे अन्यत्र देखने को नहीं मिली। मुझे आज विश्र्वास हो गया कि
भारत में आज भी अभी ऐसी कुछ संस्थायें हैं, जहाँ भरतीयता सुरक्षित है।'' हो जाते थें। उनका कहना था कि ''मेरा स्वभाव पानी का है, चूल्हे पर रख दो तो वह खौल उठेगा, नीचे उतार दो तो ठंडा हो जाएगा।''
काशी और प्रयाग के साधु समाज से स्वामी जी का सम्पर्क तो पहले से ही था किन्तु महानिर्वाणी अखाड़ा प्रयाग के महात्माओं ने विशेष रूप से इनसे सम्पर्क स्थापित किया। इनके निर्भीक स्वभाव, स्पष्ट वाणी, प्रत्युत्पन्न मतित्व, निःस्वार्थ सेवावृत्ति, देश-भिमान एवं कर्मशील जीवन से प्रभावित एवं उपकृत होकर अखिल भारतीय निर्वाणी सन्त समाज ने आखाडो के संगठन के मुख्य सचिव के पद पर सन् १९६२ ई० में आसिन किया। उस समय से लेकर जीवन पर्यंन्त स्वामी जी ने अथक युगानुरूप सम्पूर्ण निर्वाणी संस्थानों को श्रीवृद्धि की और सदा उनके विकास में कार्यरत रहें। मुख्य-सचिव के रूप में पूज्य स्वामी जी ने अपने जीवन के अंतिम क्षण तक जो उपकार एवं उत्थान का कार्य किया उसका ऋण एवं आभार सम्पूर्ण निर्वाणी अखाडा समाज स्वीकार करता है। उनके उपकारों से वंचित होने की आशंका से ही समग्र साधु समाज एवं उनके महामंनडलेश्वर भी चिकित्सा के अन्तिम दिनों में घबरा उठे। उनकी आँखों से अश्रुपात हुआ, किन्तु स्वामी जी का अंतिम उपदेश पाकर सभी को धैर्य एवं सन्तोष प्राप्त हुआ। उनका उपदेश था, ''मनुष्य को इश्वर पर विश्र्वास करके निर्भीक होकर कार्य करना चाहिए, इससे मानव जाति का उत्थान और कल्याण होगा।''
आज स्वामी जी हमारे बीच नहीं हैं। ३१ दिसम्बर सन् १९८० एवं १ जनवरी सन् १९८१ की मध्यरात्रि में वे ब्रह्मलीन हो गये। किन्तु, उनके उपदेश संकल्प, एवं सेवा के भाव को उनके उत्तराधिकारी
स्वामी भगवान गिरि जी महाराज निःस्वार्थ एवं पूरी निष्ठा से सजीव बनाये हुए हैं तथा उसके उत्तरोत्तर विकास के लिए शतत् प्रयत्नशील है। स्वामी चन्द्रशेखर गिरि जी महाराज आज भी हमारे जीवन को प्रेरणा प्रदान कर उत्सर्ग का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। हम उनकी प्रत्येक पुण्य तिथि पर उनके चरणों में अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर सदा उनकी कृपा की कामना करते है।
'देवाश्रम' मठ का संक्षिप्त परिचय :-
जनजीवन में नैतिक मूल्यों की स्थापना और आध्यात्मिकता की रक्षा करते हुए जीवन और जगत की सूक्ष्मातिसूक्ष्म गूढ़ मान्यताओं को प्रचार-प्रसार करने की दिशा में मठों की अपनी विशिष्ट परम्परा रही है। मठ और आश्रम अपने इतिहास के प्रारम्भिक काल में समाज-सापेक्ष तथा सांस्कृतिक गतिविधियों के केन्द्र के रूप में पाये जाते हैं।
पूर्वी उत्तर प्रदेश में देवरिया जनपद के दक्षिण और पूर्व की सीमा पर स्थित लार का 'देवाश्रम' मठ भारतीय संस्कृति, धर्म, राजनीति और शिक्षा का एक प्राचीन सिद्धपीठ है। इस क्षेत्र में इस सिद्धपीठ का अपना विशेष महत्व है। विविध स्त्रोतों से प्राप्त जानकारी तथा जन-श्रुतियों के आधार पर इसका इतिहास लगभग ढाई सौ वर्षो प्राचीन ठहरता है।
विश्वस्त सूत्रों के अनुसार अठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में बंगाल के मालदह जिले के अन्तर्गत तत्कालीन गोलाघाट के महन्त स्वामी लवंग गिरि के शिष्य सन्त कुशल गिरि (मौनी बाबा) तीर्थाटन के क्रम में प्रयोग आये और फिर वहाँ से काशी आकर टेकरा मठ के सामने रहने लगे। पुनः वहाँ से चल कर विभिन्न स्थानों का भ्रमण करते हुए मौनी बाबा लार के इस वर्तमान मठ को अपनी साधना भूमि बनाई जो कभी सघन जंगल के रूप में जाना जाता था। बाद में इस परम्परा में आये आठवें सिद्ध महात्मा योगिराज स्वामी देवानन्द जी महाराज ने आज से लगभग एक सौ वर्ष पूर्व यहाँ भारतीय संस्कृति से ओत-प्रोत जनजीवन निर्मित करने के उद्देश्य से 'देवाश्रम' की स्थापना की।
इस नगर के 'लार' नामकरण के पीछे भी एक किंवदन्ती है। कहते हैं, कभी यहाँ महर्षि वशिष्ठ का आश्रम था, जहाँ वे तपस्या किया करते थें। एक दिन पाश्र्ववर्ती जंगल में चरती महर्षि वशिष्ठ की गाय का एक व्याघ्र ने पीछा किया। और भयातुर गाय प्राण रक्षा हेतु भागने लगी। थकान और भयवश होकर उस गाय के मुख से जितने क्षेत्र में लार गिरा, उतने क्षेत्र को 'लार' नाम से अभिहित किया गया। महात्मा मौनी बाबा के द्वारा कुटी की स्थापना कर नित्य पूजापाठ तथा साधना करने के उपरान्त यहाँ एक मठ का स्वरूप विकसित हुआ। जहाँ दूर-दूर के महात्मा और सन्यासी आकृष्ट हुए।
इस मठ की महन्त परम्परा में सर्वप्रथम नाम बाबा 'मौनी गिरि' का आता है। इनका मूल नाम 'कुशल गिरि' था। इसके बाद मठ की अद्यावधि महन्त परम्परा विकसित होती है। इस परम्परा के पूर्वार्द्ध की जानकारी बहुत कुछ जनश्रुतियों तथा आप्त जनों से होती है। शासकीय अभिलेखों से केवल चार-पाँच पीढ़ियों की ही प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध होती है। 'दशनामी' सन्यासीयों का एक वर्ग 'गिरि' उपाधिधारी है और इस मठ की महन्त परम्परा गिरि उपाधिधारी दशनामी महन्तों की ही परम्परा में है।
सम्प्रति, इस मठ की गद्दी पर विराजमान महन्त स्वामी भगवान गिरि जी अपनी परम्परा की दसवीं पीढी में आते हैं। इनसे पूर्व की नौ पीढियों के महात्माओं में नाम क्रमशः -
१-श्री श्री १००८ स्वामी कुशल गिरि जी महाराज (मौनी बाबा),
(संस्थापक) स्थापना वर्ष-१७३०
२-श्री स्वामी महन्त रामगोपाल गिरि, (नागा बाबा)
३-श्री स्वामी सेवा गिरि जी महाराज
४-श्री स्वामी फूल गिरि जी महाराज
५-श्री स्वामी मनरूप गिरि जी महाराज
६-श्री बलिराम गिरि जी महाराज
७-श्री रामगोविन्द गिरि जी महाराज
८-श्री स्वामी देवानन्द जी महाराज
९-श्री स्वामी चन्द्रशेख गिरि जी महाराज
१०-श्री महन्थ स्वामी भगवान गिरि जी महाराज
(वर्तमान पीठाधीश्वर)
के नाम उल्लेखनीय हैं।
१-स्वामी चन्द्रशेखर गिरि बालनिकेतन विद्यालय --
स्मारक स्वरूप इस 'बालनिकेतन' की स्थापना सन् १९८३ में हुई। सम्प्रति इस बालनिकेतन में लगभग सवा सौ शिशु शिक्षा प्राप्त करते हैं। अध्यापक और अन्य कर्मचारियों की संख्या
वर्तमान आवश्यकतानुसार कुल ६ है इस संस्था को अपने स्त्रोतों से होने वाली आय की अपेक्षा बहुत कुछ अन्य स्त्रोतों से अर्जित आय पर निर्भर रहना पड़ता है। अभी आवश्यकतानुसार चार अध्यापन कक्षों तथा एक कार्यालय वाले आकार के लघु भवन में यह निकेतन संचालित हो रहा है। छोटे बच्चों के शारीरिक विकास हेतु दैनिक दिनचर्या में महाबीर हनुमान जी का प्रेरक स्वरूप ध्यान में रखने के लिए 'हनुमान चालीसा' का पाठ उल्लेख है। इसके अतिरिक्त क्रीडा उपकरणों में चर्खी, झूला तथा अन्य आवश्यक उपकरणों की व्यवस्था है। अक्षर ज्ञान हेतु विविध प्रकार के चार्ट हैं तथा भौगोलिक ज्ञान प्राप्त १-स्वामी चन्द्रशेखर गिरि बालनिकेतन विद्यालय --
स्मारक स्वरूप इस 'बालनिकेतन' की स्थापना सन् १९८३ में हुई। सम्प्रति इस बालनिकेतन
में लगभग सवा सौ शिशु शिक्षा प्राप्त करते हैं। अध्यापक और अन्य कर्मचारियों की
संख्यk वर्तमान आवश्यकतानुसार कुल ६ है इस संस्था को अपने स्त्रोतों से होने वाली
आय की अपेक्षा बहुत कुछ अन्य स्त्रोतों से अर्जित आय पर निर्भर रहना पड़ता है। अभी
आवश्यकतानुसार चार अध्यापन कक्षों तथा एक कार्यालय वाले आकार के लघु भवन में यह
निकेतन संचालित हो रहा है। छोटे बच्चों के शारीरिक विकास हेतु दैनिक दिनचर्या में
महाबीर हनुमान जी का प्रेरक स्वरूप ध्यान में रखने के लिए 'हनुमान चालीसा' का पाठ
उल्लेख है। इसके अतिरिक्त क्रीडा उपकरणों में चर्खी, झूला तथा अन्य आवश्यक उपकरणों
की व्यवस्था है। अक्षर ज्ञान हेतु विविध प्रकार के चार्ट हैं तथा भौगोलिक ज्ञान
प्राप्त करने के लिए विविध प्रकार के मानचित्रों का अच्छा संग्रह है। इस संस्था का
प्रमुख उद्देश्य है प्राचीन गुरूकुलों के परिदेश में भारतीय पद्धति से बच्चों को इस
प्रकार शिक्षित करना जिसके फलस्वरूप वे भारतीय आचार-विचारों के संस्कार ग्रहण कर
सकें, साथ ही, वर्तमान युगानुरूप नवीन ज्ञान से वंचित भी न रहें।
२-स्वामी चन्द्रशेखर गिरि बालिका विद्यालय --
उä बाल निकेतन के उपरान्त वर्तमान महन्त भगवान गिरि जी ने अपने गुरू स्वामी
चन्द्रशेखर गिरि जी महराज के तृतीय स्मारक स्वरूप सन् १९८९ में इस बालिका विद्यालय की
स्थापना की। महिलाओं में स्वाव-लम्बन की भावना का विकास तथा एक भारतीय नारी के
उत्तम आचरण के अनुरूप संस्कारों से मंडित कर उन्हें अंधरूढियों से मुक्त करना इस
बालिका विद्यालय का आदर्श है। इस समय यह बालिका विद्यालय कुल सात अध्यापन कक्षों तथा एक
कार्यालय सहित निर्माणाधीन भवन में संचालित हो रहा है। सम्प्रति, लगभग तीन सौ
छात्राएं इसमें शिक्षा प्राप्त कर रही हैं तथा इस कार्य हेतु पांच अध्यापिकाएँ
सेवारत हैं। विद्यालय को उच्च कक्षाओं तक विकसित करने हेतु प्रयास चल रहे हैं। प्रयास से सन् १९१८ में हुई थी। यहाँ इस समय संस्कृत साहित्य, व्याकरण, धर्मशास्त्र, एवं पुराणेतिहास में उच्च शिक्षा प्रदान की जाती है तथा एक 'क' वर्गीय महाविद्यालय के रूप में यह 'सम्पूर्णानन्द संस्कृत महाविद्यालय, वाराणसी' से सम्बद्ध और प्रसासित है। अध्यापकों तथा कर्मचारियों की कुल संखया आठ है। महाविद्यालय को अपनी आवश्यकता के अनुरूप पाँच कक्षों और एक कार्यालय सहित सुन्दर भवन उपलब्ध है। अब तक कुल ४९५४ शास्त्री और १२६५ आचार्य इस महाविद्यालय से निकल चुके हैं।
५-स्वामी देवानन्द इण्टरमीडिएट कॉलेज --
इस शिक्षा-संस्थान की स्थापना सन् १९३८ में हुई। प्रारम्भ में इसका स्वरूप सोमित था किन्तु कालक्रम से इसका विकास होता गया और अब इण्टरमीडिएट स्तर तक कला, विज्ञान, वाणिज्य और कृषि वर्ग की कक्षायें संचालित करने वाला यह विद्यालय इस अंचल के सुविकसित शिक्षा संस्था के रूप में ख्यातिलब्ध है।
विद्यालय की छात्र संख्या इस समय ढाई हजार से ऊपर है तथा कुल ५६ अध्यापक, ६ लिपिक और १८ परिचालक इसमें अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। २५ अध्यापन कक्षों, ६ प्रयोगशालाओं, प्राचार्य कक्ष और प्रशासनिक उपयोग हेतु निर्मित कुल लगभग ४० कक्षों वाले एक भव्य भवन में विद्यालय संचालित होता है। संस्था के पास अपना विशाल क्रीड़ा क्षेत्र है तथा एन०सी०सी० प्रशिक्षण, नियमित व्यायाम, क्रीडा प्रतियोगितायें, और अन्य प्रकार के सांस्कृतिक और साहित्यिक कार्यकलापों से सत्र् पर्यन्त चलने वाले कक्ष गत अध्यापन कार्यों के अतिरिक्त द्रौक्षिक वातावरण सुभल रहता है। अभी तक इस विद्यालय से कुल दस हजार तीन सौ उनहत्तर छात्र हाईस्कूल और नौ हजार तीन सौ पैतालिस छात्र इण्टरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके हैं। इनमें अनेक इन्जीनियर, डॉक्टर, प्रशासन और प्रोफेसर के महत्वपूर्ण पदों पर कार्य करते हुए राष्ट्र की सेवा कर रहे हैं।
अपने स्थापना काल से अब तक इस शिक्षा संस्था ने अर्द्धशताब्दी की एक यशस्वी यात्रा की है। भविष्य के लिए इसकी अपनी विकासोन्मुख योजनायें हैं। स्वर्ण जयन्ती समारोहों की अवधि में एक सभागार का निमार्ण, क्रीडा क्षेत्र की चारदीवारी एवम् वर्तमान भवन के ऊपर अतिरिक्त कक्षों के निमार्ण की योजना प्रस्तावित है।
६-स्वामी देवानन्द स्नातक महाविद्यालय --
'देवाश्रम' के आठवें यशस्वी महन्त योगिराज स्वामी देवानन्द जी के ब्रह्मलीन होने के उपरान्त उनकी अन्तिम इच्छा की पूर्ति हेतु कर्मयोगी स्वामी चन्द्रशेखर गिरि जी महाराज के सत्य प्रयासों से इस महाविद्यालय की स्थापना सन् १९६४ के जुलाई मास में हुई। प्रथम वर्ष में कला संकाय के स्नातक स्तर की कक्षायें संचालित करने की मान्यता प्राप्त करने के बाद तृतीय वर्ष से विज्ञान संकाय के अन्तर्गत गणित वर्ग और जीव विज्ञान वर्ग के सभी विषयों के अध्ययन हेतु शासन से मान्यता प्राप्त की गयी। इसके उपरान्त क्षेत्रीय जनाकांक्षा को ध्यान में रखते हुए महाविद्यालय के तत्कालीन प्रबन्धक कर्मयोगी स्वामी चन्द्रशेखर गिरि जी महाराज ने कठोर शासकीय शर्तों को पूरा करने के उपरान्त सन् १९७५ में प्रशिक्षण (बी०एड०) विभाग की मान्यता प्राप्त की इस प्रकार महाविद्यालय, सम्प्रति कला, विज्ञान और प्रशिक्षण विभाग के स्नातक स्तर तक की कक्षाओं का संचालन करते हुए अपने जीवन के पचीसवें वर्ष की ओर अग्रसर है।
महाविद्यालय की छात्र संख्या लगभग दो हजार तक विगत वर्षो में रहती आयी है। संस्था में प्राचार्य सहित कुल ३० अध्यापक अध्यापन कार्य करते हैं। पुस्तकालयाध्यक्ष, लिपिक, प्रयोगशाला सहायक और परिचालक के रूप में अन्य पचीस कर्मचारी विभिन्न कार्यों हेतु सेवारत है। अब तक कुल १०५६५०० कला स्नातक ६९४५० विज्ञान स्नातक तथा ५२४५ बी० एड० प्रशिक्षित स्नातक इस महाविद्यालय से निकल चुके हैं।
महाविद्यालय इस समय अपने नवनिर्मित भवन, में सचालित होता है। इसका नवनिर्मित भवन, अपनी विभिन्न आवश्यकताओं के अनुरूप अध्यापन कक्ष होते हुए भी अभी अपूर्ण है। भविष्य में इस भवन को पूर्ण करने हेतु एक महत्वाकांक्षी योजना तैयार है। एक भव्य व्यायामशाला का निर्माण पूरा हो चुका है। स्नातकोत्तर कक्षाओं के लिए 'केन्द्रीय स्नातकोत्तर भवन' विज्ञान संकाय के लिए प्रयोगशालाओं सहित एक स्वतन्त्र भवन, सभागार, और छात्रावासों का निर्माण हो चुका है। तथा पी०जी० भवन, इनडोर स्डेडियम कर्मचारी आवास, महिला छात्रावास के निर्माण का प्रस्ताव है, कुल मिलाकर महाविद्यालय अपने द्रुत विकास की दिशा में है। इसके वर्तमान स्वरूप को विकसित करने की दिशा में कार्य प्रारम्भ है।