Contact Us

For Any Support Please Contact
Ajay Kumar Upadhyay (10:00am To 04:00pm)

Telephone:9336076028
FAX:05566-236325
E-mail: sdpg1964@gmail.com

Seat Detailed
Reported For Admission

About College

पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के संरक्षण में लार (जिला-देवरिया उ०प्र०) में स्थापित यह महाविद्यालय उ०प्र० राज्य के पूर्वी क्षेत्र में गोरखपुर मण्डल से १०० कि०मी० की दूरी पर पूरब दिशा में विहार प्रांन्त के निकट स्थापित है। युगों-युगों से यह भूमि महापुरुषों एवं मनीषियों के उत्पत्ति का केन्द्र रही है। जिनके योग साधना से यह भूमि जीवन को सरल एवं विशिष्ट बनाने का मुखय स्रोत शिक्षा का सर्वोत्तम केन्द्र बना। पंचायती अखाडा महानिर्वाणी के महापुरषों ने शिक्षा की उपयोगिता को बहुत पूर्व में ही माप लिया था, इसी को दृष्टि में रख कर लोक कल्याण के लिए निःस्वार्थ भाव से इस ग्रामीण अंचल में शिक्षा की क्रांन्ति प्रारम्भ की। अंग्रेजी हुकूमत के अधीनता को स्वीकार न करते हुए स्वशिक्षा का संकल्प इन महापुरूषो को शिक्षा में क्रांन्ति को उद्‌द्वेलित करने लगी। इसी संकल्प के साथ सर्वप्रथम सन्‌ १९२६ में प्राथमिक शिक्षा की नींव डाल दी। फिर क्या था शिक्षा की जो धारा प्रवाहित हुई वह आज तक अपने अविरल गति से बह रही है।प्राथमिक शिक्षा की स्थापना के उपरान्त जू० हा० स्कूल, माध्यमिक शिक्षा केन्द्र आदि की स्थापना की गयी ।इन तमाम संस्थाओं की स्थापना के सफलता के क्रम में ही सन्‌ १९६४ में उच्च शिक्षा के केन्द्र स्वामी देवानन्द स्नातकोत्तर महाविद्यालय मठ-लार, देवरिया उ०प्र० (भारत) की स्थापना पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के सेक्रेट्री एवं इस मठ के महन्थ ब्रहम्लीन कर्मयोगी स्वामी चन्द्रशेखर गिरि जी महाराज ने अपने परमपूज्य गुरूदेव ब्रहम्लीन कर्मयोगी स्वामी देवानन्द जी महाराज की पूण्य स्मृति में की। पूज्यनी स्वामी चन्द्रशेखर गिरि जी महाराज का कहना था कि संघर्ष विकास पुरुष का शक्तिशाली शस्त्र है, ध्यान इतना ही देना है कि इसका प्रयोग सही व्यक्ति द्वारा होना चाहिए। इस संदर्भ में श्रद्धेय महाराज जी एक बडा ही रोचक उदाहरण प्रस्तुत करते थें, दो व्यक्ति हो जो बहुत ही परिश्रमी है दोनो को पूर्व दिशा में एक स्थान पर जाना है, एक व्यक्ति सही दिशा (पूर्व) में आराम से चलना शुरू करता है, जबकी दूसरा पश्चिमम दिशा में अपनी पूरी ताकत के साथ दौड लगाता है, तो आप उसके परिणाम का आंकलन कर सकते है। कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन को सफल एवं स्वर्णिम बनाने के लिये सही दिशा का चयन अत्यन्त आवश्यक है और वह सिर्फ उच्च शिक्षा से ही सम्भव है। महाविद्यालय के प्रारम्भिक अस्तित्व में इसका स्वरूप उतना ही बृह्‌द था जितना की इसके स्थापना के लिए मानक था। परन्तु कालान्तर में जैसे-जैसे शिक्षा के प्रति जन जागृति होने लगी वैसे-वेसे ही महाविद्यालय की समस्याए भी बढ ने लगी। परन्तु श्रद्धेय महाराज जी अपने प्रयासों से समस्याओं का निराकरण करते रहें। महानिर्वाणी आखाडा के पुरुषों का यह साधुवाद रहा कि इस संस्था में बाल रूप में शिक्षा का प्रवेश करने वाला बालक अपने यौवनावस्था में यहाँ से समाज के सेवार्थ जाने योग्य हो जाता था। यानी शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक के शिक्षा ग्रहण करने के माध्यम इस संस्था में उपलब्ध है।

Next