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स्वामी देवानन्द स्नातकोत्तर महाविद्यालय

मठ - लार, देवरिया

जनजीवन में नैतिक मूल्यों की स्थापना और आध्यात्मिकता की रक्षा करते हुए जीवन और जगत सूक्ष्मातिसूक्ष्म गूढ़ मान्यताओं का प्रचार - प्रसार करने की दिशा में मठों की अपनी विशिष्ट परम्परा रही है | मठ और आश्रम अपने इतिहास के प्रारम्भिक काल में समाज - सापेक्ष तथा सांस्कृतिक गतिविधियों के केन्द्र के रूप में पाये जाते है |

पूर्वी उत्तर प्रदेश में देवरिया जनपद के दक्षिण और पूर्व की सीमा पर स्थित लार का ' देवाश्रम ' मठ भारतीय संस्कृति , धर्म , राजनीति और शिक्षा का एक प्राचीन सिद्धपीठ है | इस क्षेत्र में इस सिद्धपीठ का अपना विशेष महत्व है | विविध स्त्रोतों से प्राप्त जानकारी तथा जन-शुरुतियो के आधार पर इसका इतिहास लगभग ढाई सौ वर्षो प्राचीन ठहरता है |

पूविश्वश्त सूत्रों के अनुसार अठारवी शताब्दी के पूर्वबद्ध में बंगाल के मालदल जिले के अंतर्गत तत्कालीन गोलाघाट के महंत स्वामी लवंग गिरी के शिष्य संत कुशल गिरी (मौनी बाबा ) तीर्थटन के क्रम में प्रयोग आये और फिर वहा से काशी आकर टेकरा मठ के सामने रहने लगे | पुनः वहा से चल कर बिभिन्न संस्थानों का भ्रमण करते हुए मौनी बाबा लार के इस बर्तमान मठ को अपनी साधना भूमि बनाई जो कभी सघन जंगल के रूप में जाना जाता था | बाद में इस परमपरा में आये आठवे सिद्ध महात्मा योगिराज स्वामी देवानंद जी महाराज ने आज से लगभग एक सौ पूर्व यहाँ भारतीय संस्कृति से ओत-प्रोत जनजीवन निर्मित करने के उद्देश्य से 'देवाश्रम ' की संस्थापना की |

इस नगर के ' लार ' के पीछे एक किवदंती है | कहते है , कभी यहाँ महर्षि वशिष्ठ का आश्राम था , यहाँ वे तपस्या किया करते थे | एक दिन पाश्र्ववर्ती जंगल में चरति महर्षि वशिष्ठ की गाय का एक ब्याघ्र ने पीछा किया | और भयातुर गाय प्राण रक्षा हेतु भागने लगी | थकान और भयवश होकर उस गाय के मुख से जितने क्षेत्र में लार गिरा , उतने क्षेत्र को ' लार ' नाम से अभिहित किया गया | महात्मा मौनी बाबा के द्वारा कुटी की संस्थापना कर नित्य पूजापाठ तथा साधना करने के उपरांत यहाँ एक मठ का स्वरुप विकसित हुआ | जहा दूर-दूर के महात्मा और सन्यासी आकृष्ठ हुए

इस मठ की महंत परंपरा में सर्वप्रथम नाम बाबा ' मौनी गिरी ' का आता है | इनका मूल नाम ' कुशल गिरी ' था | इसके बाद मठ की अध्यावती महंत परम्परा विकिसत होती है | इस परम्परा के पूर्वाबद्ध की जानकारी बहुत कुछ जनश्रुतियो तथा आप्त जनो से होती है | शासकीय अभिलेखों से केवल चार-पांच पीडियो की ही प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध होती है | 'दसनामी ' सन्यासियों का वर्ग ' गिरी ' उपाधिधारी दसनामो की परमपरा में है |

सम्प्रति , इस मठ की गद्दी पर बिराजमान महंत स्वामी भगवान् गिरित जी अपनी परम्परा की दसवीं पीढ़ी में आते है | इनसे पूर्व की नौ पीडियो के महात्माओ में नाम कर्मश:-

  1. श्री श्री १००८ स्वामी कुशल गिरी जी महाराजा (मौनी बाबा )

  2. श्री स्वामी महंत रामगोपाल गिरी, (नागा बाबा )

  3. श्री स्वामी सेवा गिरी जी महाराज

  4. श्री स्वामी फूल गिरी महाराज

  5. श्री स्वामी मनरूप गिरी जी महाराज

  6. श्री स्वामी बलिराज गिरी जी महाराज

  7. श्री रामगोविंद जी महाराज

  8. श्री स्वामी देवानंद जी महाराज

  9. श्री स्वामी चंद्रशेख गिरी जी महाराज

  10. श्री महंथ स्वामी भगवान गिरी जी महराज (बर्तमान पीठाधीश्वर )